Thursday, February 14, 2013

Bollywood tragedy king 'दिलीप कुमार'

              
हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री का एक दमकता सितारा दिलीप कुमार का असली नाम मोहम्मद युसुफ खान है। दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसंबर साल 1922 में हुआ था। पाकिस्तान के पेशावर में दिलीप साहब के पिता का फलों का बागीचा था। जिसके बाद उन्होंने मुंबई के दाबोली में फलों का एक बागीचा खरीदा। साल 1930 में दिलीप साहब का पूरा परिवार मुंबई आकर बस गया। साल 1940 में दिलीप साहब ने अपने पिता से ख्वाहिश जताई कि वो फिल्मों में काम करना चाहते हैं लेकिन उनके पिता ने मना कर दिया। पिता से नाराज़ होकर उन्होंने मुंबई छोड़ दी और पुणे का रुख किया। पुणे में दिलीप कुमार ने कुछ दिनों तक कैंटीन चलाने और ड्राइ फ्रूट की सप्लाई करने का काम किया। साल 1943 में देविका रानी और हिमांशु राय ने दिलीप साहब को आउंध मिलिट्री कैंटीन में देखा, दिलीप यानि युसुफ साहब को देखकर हिमांशु राय ने उन्हें फिल्म में काम करने का ऑफर दिया... युसुफ साहब ने हां कर दी और बॉम्बे टॉकीज़ के बैनर तले युसुफ साहब को पहली फिल्म मिली ज्वार भाटा...
                                                
दिलीप कुमार ये नाम ये नाम उन्हें हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक भगवती चरण वर्मा ने दिया था । फिल्म की सफलता के बाद मानों दिलीप साहब की सफलता में चार चांद लग गए। और हर फिल्म एक रिकॉर्ड बनाने लगी। इस दौरान कई हिरोइन्स के साथ दिलीप साहब ने काम किया। फिल्मों में निभाई गई भूमिका के अनुरुप ऑडियन्स ने दिलीप साहब को ट्रैजिडी किंग का दर्जा दे दिया। दिलीप कुमार के लिए कई गायकों ने अपनी आवाज़ दी जिसमें सबसे ज़्यादा मो. रफी के गीत शामिल हैं... इसके अलावा तलत महमूद और मुकेश ने भी दिलीप कुमार के लिए काफी हिट नंबर्स दिये। किशोर कुमार ने भी दिलीप कुमार के लिए 1974 में आई फिल्म सगीना में साला मै तो साहब बन गया गीत गाया जो कि काफी मशहूर हुआ। इस गाने की कई जगहों पर आलोचना भी की गई क्योंकी पहली बार किसी गाने में साला शब्द का इस्तेमाल किया गया था। साल 1966 में दिलीप कुमार ने सायरा बानो से शादी की। जिस वक्त सायरा बानो की दिलीप कुमार से शादी हुई दिलीप कुमार 44 साल के थे जबकि सायरा बानो सिर्फ 22 साल की थीं। इससे पहले दिलीप कुमार की शादी आशमा नाम की पाकिस्तानी महिला से हुई थी। सायरा बानो से शादी करने के लिए दिलीप कुमार ने आशमा को तलाक दे दिया। दिलीप कुमार के तीन भाई भी थे जिनका नाम नसीर खान, एहसान खान और असलम खान था। नसीर खान दिलीप कुमार के साथ कुछ फिल्मों में भी नज़र आए। फिल्म बैराग और गंगा जमुना में नसीर दिलीप कुमार के साथ काम कर चुके हैं। 70 के दशक में दिलीप कुमार को राजेश खन्ना और अमिताभ जैसे सितारों से खासी टक्कर मिलने लगी।
                                         
इसके बाद दिलीप कुमार के खाते में कुछ फ्लॉप फिल्में भी जुड़ी लेकिन साल 1976 में आई फिल्म बैराग ने उन्हें एक लंबे वक्त के बाद सफलता दिलाई। इस सफलता के बाद दिलीप कुमार ने फिल्म इंडस्ट्री से कुछ दिनों का ब्रेक लिया और 5 साल तक काम नहीं किया जिसके बाद वो सीधे नज़र आए साल 1981 में आई फिल्म क्रांति में, जो कि एक मल्टीस्टारर फिल्म थी। इसके बाद साल 1982 में आई फिल्म शक्ति में उनके साथ अमिताभ बच्चन और रेखा ने काम किया। इस फिल्म में दिलीप कुमार अमिताभ के पिता के रुप में नज़र आए। दिलीप कुमार का नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे ज़्यादा अवॉर्ड पाने वालों में भी दर्ज है। दिलीप साहब को 8 फिल्म फेयर पुरस्कार मिले जबकि वो 19 बार फिल्म फेयर के पुरस्कार के लिए नामित हुए। 1991 में दिलीप साहब को पद्म भूषण से नवाज़ा गया जबकि उन्हें साल 1993 में फिल्म फेयर लाइफ टाइम एचीवमेंट पुरस्कार से नवाज़ा गया। साल 1994 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी दिलीप साहब को नवाज़ा गया। जबकि साल 1998 में पाकिस्तान सरकार ने दिलीप कुमार को निशान-ए-इम्तियाज़ के अवॉर्ड ने नवाज़ा। हालांकि उस वक्त कारगिल लड़ाई हो गई थी लिहाजा भारत के कई लोगों ने दिलीप कुमार पर दबाव ड़ाला कि वो इस सम्मान को वापस कर दे। लेकिन दिलीप कुमार ने कहा कि राजनीतिक कारणों के चलते वो ये सम्मान वापस नहीं करेंगे। साल 1998 में आई फिल्म किला में दिलीप कुमार आखिरी बार बड़ी स्क्रीन पर नज़र आए थे। जिसमें उन्होंने अमरनाथ सिंह का किरदार निभाया था। जबकि बॉक्स ऑफिस पर सफलता की बात की जाए तो साल 1991 में राजकुमार के साथ आई उनकी फिल्म सौदागर उनकी आखिरी हिट फिल्म थी।

Wednesday, February 13, 2013

First female star 'देविका रानी'

मूक फिल्मों के पर्दे पर उतरने के बाद जैसे लोगों में धीरे धीरे फिल्मों के लिए दीवानगी छा रही थी... साल 1933 में फिल्म कर्मा ने लोगों में काफी सराहना पाई... इस फिल्म से एक अभिनेत्री का फिल्मों में पदार्पण हुआ और वो अभिनेत्री थी देविका रानी... देविका रानी को भारत की पहली महिला अभिनेत्री या महिला स्टार माना जाता है... इसका मुख्य कारण था कि उस वक्त महिलाओं को अभिनय क्षेत्र में पसंद नहीं किया जाता था... लिहाज़ा पर्दे पर महिला किरदार को देखने की ललक ने सिनेमा हॉल में दर्शकों की संख्या बढ़ाने में काफी अहम भूमिका निभाई... और देविका रानी को रातों रात सफलता मिली... हालांकि देविका रानी से पहले फिल्म आलम आरा में ज़ुबैदा ने आलम आरा की भूमिका निभाई थी और उसे काफी सराहा भी गया लेकिन देविका रानी के पदार्पण के बाद लोगों ने उन्हें स्टार की पद्वी पर बैठा दिया...
देविका रानी का जन्म साल 1908 में विशाखापत्तनम में हुआ था... उनका पूरा नाम देविका रानी चौधरी था... देविका रानी संपन्न परिवार से थीं लिहाज़ा पढ़ने के लिए उन्हें लंदन भेजा गया... यहीं पर उनकी मुलाकात हिमांशु ऱाय से हुई... हिमांशु रॉय को भी फिल्मों के निर्माण में खासी दिलचस्पी थी और यही वजह थी कि देविका रानी और हिमांशु रॉय की नज़दीकियां बढ़ने लगी और साल 1929 में दोनों ने शादी कर ली... शादी के बाद साल 1930 में एक फिल्म के निर्माण के सिलसिले में हिमांशु रॉय और देविका रानी जर्मनी गए... और फिल्म निर्माण के सभी गुण सीखने के बाद भारत वापस लौट आए... इसके बाद भारत में ही दोनों ने फिल्मों के निर्माण की शुरुआत की और नींव पड़ी बॉम्बे टॉकीज़ की... फिल्म कर्मा से देविका रानी को प्रसिद्धि मिली... और यहीं से उनके साथ साथ हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री भी सफलता के नए कदम चूमती जा रही थी... साल 1940 में हिमांशु रॉय के निधन के बाद बॉम्बे टॉकीज़ की सारी ज़िम्मेदारी देविका रानी ने संभाली... इसमें अशोक कुमार और अन्य साथियों ने उनकी काफी मदद करने की भी कोशिश की लेकिन आखिरकार साल 1944 में देविका रानी ने सफलता की उम्मीद छोड़ दी और सेतोस्लाव रोरिक नाम के रुसी व्यक्ति से शादी करके बैंगलोर (वर्तमान बैंगलुरु) जाकर बस गईं...

Sunday, February 10, 2013

Indian Film Icon अशोक कुमार 'दादा मुनि'

दादा मुनि... अशोक कुमार को फिल्म इंडस्ट्री इसी नाम से पुकारती है... दादा मुनि मध्य प्रदेश के खंडवा में पैदा हुए थे... अशोक कुमार के दो और भाई फिल्मों से जुड़े जिनमें से एक थे किशोर कुमार और दूसरे थे अनूप कुमार... इस तीनों भाइयों को एक साथ 'चलती का नाम गाड़ी' और 'बढ़ती का नाम गाड़ी' में देखा जा सकता है... दादा मुनि याने के अशोक कुमार के फिल्मों में आने का किस्सा बेहद की रोचक है...  अशोक कुमार के पिता वकील थे लिहाज़ा अपने बड़े बेटे को वो वकील बनाना चाहते थे... लेकिन अशोक कुमार फिल्म डायरेक्टर बनना चाहते थे... लिहाज़ा उन्होंने संपर्क किया अपने जीजा शशिधर मुखर्जी से... जो कि उन दिनों फिल्मों के निर्माण से जुड़े हुए थे...अशोक कुमार के दो भाई और एक बहन थी जिसका नाम सती देवी था उनकी शादी अशोक कुमार ने अपने कॉलेज के दोस्त शशिधर मुखर्जी से करवाई... शशिधर मुखर्जी ही अशोक कुमार को फिल्मों में लाए...
                                 

अशोक कुमार को फिल्मों का काफी शौक था और वो मुंबई के न्यू थियेटर में लैब असिस्टेंट का काम कर रहे थे... फिल्मों के प्रति उनका रुझान देखते हुए शशिधर ने उन्हें बॉम्बे टॉकीज़ बुला लिया...जिसके बाद फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर के लिए दादा मुनि हिमांशु रॉय के संपर्क में आए... एक दिन फिल्म के सेट से हीरो नदारद हो गया... शूटिंग की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं... लिहाजा ज़रूरी था कि काम पूरा किया जाए... आनन फानन में फैसला किया गया कि अशोक कुमार फिल्म के हीरो होंगे... अशोक कुमार हीरो बनना नहीं चाहते थे लेकिन हिमांशु रॉय के दबाव और वक्त की नज़ाकत को देखते हुए उन्होंने हीरो बनना स्वीकार कर लिया... पहले शॉट से जुड़ा बेहद दिलचस्प किस्सा है कि अशोक कुमार को दौड़ कर विलेन को मारना था... और एक्शन बोलने पर शॉट शुरु होना था... अशोक कुमार पहली बार कोई शॉट खुद देने जा रहे थे... लिहाज़ा थोड़ी टेंशन ज़रूर थी और इसी टेंशन का नतीजा रहा कि बिना एक्शन बोले ही अशोक कुमार दौड़ कर विलेन से भिड़ गए और असलियत में ही उसे धक्का दे दिया... जिससे शॉट के दौरान विलेन के पांव में चोट लग गई... इसके बाद उनकी फिल्म अछूत कन्या ने कई रिकॉर्ड तोड़े....देविका रानी के साथ फिल्म में काम करने के बाद अशोक कुमार भी फिल्म इंडस्ट्री के सितारों में शुमार हो गये... फिल्म इंडस्ट्री में आने से अशोक कुमार के घरवाले काफी नाराज़ हो चुके थे लेकिन अशोक कुमार की मां ने फिल्म  देखने के बाद अशोक कुमार को माफ ही नहीं किया बल्कि उनको आगे काम करने के लिए आज़ादी भी दे दी... क्या आप जानते हैं क्यों... क्योंकी उन्होंने अछूत कन्या देखने के बाद कहा कि फिल्मों में काम करने के बाद भी उनके लड़के ने संस्कारों का ध्यान रखते हुए फिल्म की हिरोइन को एक बार भी छुआ नहीं... घर से फिल्मों में आज़ादी मिलने के बाद अशोक कुमार ने भी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा...सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म काफी पसंद की गई और इसके साथ ही अशोक कुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री मे अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए... इसके बाद देविका रानी के साथ अशोक कुमार ने कई फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों में 1937 मे प्रदर्शित फिल्म इज्जत के अलावा फिल्म सावित्री (1938) और निर्मला (1938) जैसी फिल्में शामिल हैं। इन फिल्मों को दर्शको ने पसंद तो किया, लेकिन कामयाबी का श्रेय बजाए अशोक कुमार के फिल्म की अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया। इसके बाद उन्होंने 1939 मे प्रदर्शित फिल्म कंगन, बंधन 1940 और झूला 1941 में अभिनेत्री लीला चिटनिश के साथ काम किया। इन फिल्मों मे उनके अभिनय को दर्शको द्वारा काफी सराहा गया, जिसके बाद अशोक कुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री मे स्थापित हो गए। अशोक कुमार को 1943 मे बांबे टाकीज की एक अन्य फिल्म किस्मत में काम करने का मौका मिला। इस फिल्म में अशोक कुमार ने फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेता की पांरपरिक छवि से बाहर निकल कर अपनी एक अलग छवि बनाई। इस फिल्म मे उन्होंने पहली बार एंटी हीरो की भूमिका की और अपनी इस भूमिका के जरिए भी वह दर्शको का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने मे सफल रहे।
                                            
 किस्मत ने बॉक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड़ते हुए कोलकाता के चित्रा सिनेमा हॉल में लगभग चार वर्ष तक लगातार चलने का रिकार्ड बनाया। बांबे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय की मौत के बाद 1943 में अशोक कुमार बॉम्बे टाकीज को छोड़ फिल्मिस्तान स्टूडियों चले गए। वर्ष 1947 मे देविका रानी के बाम्बे टॉकीज छोड़ देने के बाद अशोक कुमार ने बतौर प्रोडक्शन चीफ बाम्बे टाकीज के बैनर तले मशाल जिद्दी और मजबूर जैसी कई फिल्मों का निर्माण किया... इस प्रोडक्शन कंपनी ने आखिरी फिल्म का निर्माण किया जिसमे अशोक कुमार के साथ मधुबाला ने बड़े पर्दे पर पदार्पण किया... ये मधुबाला की पहली फिल्म थी... और इस जोड़ी ने कामयाबी के काफी सारे रिकॉर्ड्स को ध्वस्त किया...अशोक कुमार के दो भाई किशोर और अनूप ने भी फिल्मों को अपना कैरियर बनाया... फिल्मों में काम करने के लिए अशोक कुमार ने संगीत सीखा था लेकिन किशोर कुमार ने बिना संगीत सीखे फिल्मों में गायक के रुप में अपनी एक अलग पहचान बनाई तो वहीं अनूप कुमार बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार के रुप में उभरे ...अशोक कुमार की दो बेटियां थीं जिनमें से एक का नाम था रुपा गांगुली और दूसरी का नाम था प्रीति गांगुली... रुपा गांगुली की शादी फिल्मों में हास्य भूमिका निभा चुके देवेन वर्मा से हुई... शशिधर मुखर्जी के बारे में आपको बता दें कि शशिधर मुखर्जी फिल्म स्टार जॉय मुखर्जी के पिता थे... और फिल्म अभिनेत्री काजोल और रानी मुखर्जी के दादा... अशोक कुमार ने 275 फिल्मों में काम के साथ साथ छोटे पर्दे पर भी बखूबी काम किया... एक्टिंग के साथ साथ उन्हें पेंटिंग का भी काफी शौक था... लेकिन 90 साल की उम्र में चेंबूर स्थित उनके घर में उनका निधन हो गया... और हिन्दी फिल्मों का ये सूरज सदा के लिये अस्त हो गया...

Thursday, February 7, 2013

Milestone Indian film production house 'बॉम्बे टॉकीज़'


सिनेमा का इतिहास इस मामले में काफी रोचक रहा है कि शुरुआती दौर में जब लोग ज़्यादा फिल्मों के बारे में नहीं जानते थे और फिल्म इंडस्ट्री करियर के तौर पर जानी नहीं जाती थी... उस वक्त ज्यादातर लोग अपने परिवार या मित्रों के साथ फिल्मों का निर्माण करते थे... दादा साहेब फाल्के से प्रेरणा पाकर कई लोग फिल्मों के निर्माण में आ गए... जिनमें से एक थे हिमांशु रॉय... हिमांशु रॉय ने स्थापना की बॉम्बे टॉकीज़ की... हिमांशु रॉय ने फिल्में बनाना शुरु तो शशिधर मुखर्जी उनके सहयोगी थे... हिमांशु रॉय का जन्म 1892 में हुआ था... या यूं कहें कि फिल्म इंडस्ट्री और हिमांशु रॉय साथ साथ बड़े हुए... बॉम्बे टॉकीज का जन्म साल 1934 में हुआ लेकिन इससे पहले हिमांशु रॉय ने कई मूक फिल्मों का निर्माण किया था... गॉडेस (1922), लाइट ऑफ एशिया (1925), सिराज (1926) और ए थ्रो ऑफ डाइस (1928) प्रमुख रहीं... इसके बाद साल 1933 में आई फिल्म कर्मा जिसमें पहली बार देविका रानी ने फिल्मों में कदम रखा...कर्मा का निर्माण अंग्रेज़ी भाषा में किया गया था... इसका निर्देशन हिमांशु रॉय ने किया था... हिमांशु रॉय और देविका रानी ने इस फिल्म के बाद जवानी की हवा, जीवन नैया, जन्मभूमि और अछूत कन्या में साथ काम किया... अछूत कन्या एक मील का पत्थर साबित हुई... इसी फिल्म ने अशोक कुमार के फिल्मी करियर की शुरुआत की... आपको जानकर ताज्जुब होगा कि अशोक कुमार को फिल्मों में लाने का श्रेय शशिधर मुखर्जी को जाता है... शशिधर मुखर्जी रिश्ते में अशोक कुमार के जीजा थे... साल 1936 में फिल्म आई अछूत कन्या से अशोक कुमार और देविका रानी की हिट जोड़ी मानों दर्शकों के दिलों में घर कर गई... और इस जोड़ी ने एक के बाद एक हिट फिल्मों की झड़ी लगा दी...
                                 
साल 1940 में हिमांशु रॉय के निधन के बाद बॉम्बे टॉकीज़ की सारी ज़िम्मेदारी देविका रानी ने संभाली... इसमें अशोक कुमार और अन्य साथियों ने उनकी काफी मदद करने की भी कोशिश की लेकिन आखिरकार साल 1944 में देविका रानी ने उम्मीद छोड़ दी और सेतोस्लाव रोरिक से शादी करके बैंगलोर (वर्तमान बैंगलुरु) जाकर बस गईं... देविका रानी का बॉम्बे टॉकीज़ से नाता तोड़ने के बाद इसे फिल्मिस्तान के नाम से इस्तेमाल किया जाने लगा... साल 1949 में इसी प्रोडक्शन की आखिरी फिल्म महल से दो बड़े कलाकारों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री की और वो दोनों थे अभिनेत्री मधुबाला और भारत कोकिला लता मंगेशकर... फिल्म इंडस्ट्री में दोनों के ही योगदान से हम सभी अच्छी तरह से वाकिफ हैं...

First Indian Production House 'प्रभात फिल्म कंपनी'

                            
हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री यूं तो अपनी एक अलग पहचान रखती है लेकिन इस इंडस्ट्री का जन्म मराठी फिल्म इंडस्ट्री से हुआ ये कहना गलत नहीं होगा... इस लिस्ट में 1929 में आई प्रभात फिल्म कंपनी का योगदान काफी अहम है... साल 1920 में बाबूराव पेंटर मूक फिल्मों के निर्माण के क्षेत्र में काफी काम कर रहे थे... इन्हीं के साथ मिलकर कुछ और लोग भी काम कर रहे थे... जिनमें विष्णुपंत दामले, वी. शांताराम, के धाइबर और एस फत्तेलाल शामिल थे... इन लोगों ने फिल्म निर्माण की कई बारीकियां बाबूराव पेंटर से सीखीं थी... फिल्मों ने निर्माण के लिए प्रमुख फायनेंसर बाबूराव थे लिहाज़ा सभी काम उनके हिसाब से होते थे... वी शांताराम को उनका काफी करीबी माना जाता था...लेकिन कुछ सालों के बाद बाबूराव से अनबन के चलते इन सभी लोगों ने अपना काम अलग करने का विचार किया... फिल्मों के निर्माण के लिए पैसा ज़रुरी था लिहाज़ा सोने के व्यापारी एस कुलकर्णी को साथ लेकर एक नई टीम बनाई गई... और 1 जून 1929 को प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना हुई...
                                             

शुरुआती वक्त में इसे सिर्फ 15,000 रुपये से शुरु किया गया... उस वक्त 15,000 रुपये काफी ज़्यादा थे... चूंकि फिल्म क्षेत्र में दिन ब दिन तरक्की हो रही थी... और मुंबई को फिल्म निर्माण का हब माना जाने लगा था... लिहाज़ा ये टीम सितंबर 1933 में मुंबई के नज़दीक पुणे आ गई... और साल 1934 में प्रभात फिल्म कंपनी के स्टूडियो की विधिवत शुरुआत की गई... इस शुरुआत के बाद प्रभात फिल्म कंपनी ने कई फिल्मों का निर्माण किया जिनमें प्रमुख थीं... अमृत मंथन(1935), संत तुकाराम (1936), कुंकु(1937) और माणुस (1939)... प्रभात की  फिल्म संत तुकाराम साल 1936 में काफी बड़ी हिट साबित हुई थी... क्या आप जानते हैं कि उस वक्त इस फिल्म को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार से नवाज़ा गया था... इतना ही नहीं ये फिल्म आज भी वहां के कोर्स में शामिल है... साल 1942 में वी शांताराम इस टीम से अलग हो गये... और उन्होंने अलग से फिल्मों का निर्माण शुरु करना तय किया...और राजकमल कला मंदिर स्टूडियो की शुरुआत की... शांताराम के अलग हो जाने के बाद प्रभात स्टूडियो बिखर गया और 13 अक्टूबर साल 1953 में इसे बंद कर दिया गया... लेकिन फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया में आज भी प्रभात फिल्म कंपनी की यादों के सहेज कर रखा गया है...

First Indian sound film 'आलम आरा'


                       
मूक फिल्मों के बाद बोलती फिल्मों के चलन की शुरुआत हुई फिल्म आलम आरा से... 'ख़ान बहादुर अर्दशीर ईरानी' की फिल्म 'आलम आरा' एक राजकुमार और एक गरीब लड़की की प्रेमकहानी पर आधारित थी... इस फिल्म में प्रमुख किरदार निभाए थे मास्टर विट्ठल, ज़ुबैदा और पृथ्वीराज कपूर ने... ये फिल्म बंबई(मुंबई) के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में 14 मार्च 1931 को रिलीज़ की गई... बोलती फिल्म को देखने के लिए लोगों की इतनी भीड़ इकट्ठा हो गई कि फिल्म की रिलीज़ के दिन पुलिस को भीड़ पर काबू पाने की नौबत आ गई थी... ये फिल्म 124 मिनट की थी...

                              
ये फिल्म साल 1929 में आई अंग्रेज़ी फिल्म 'शो बोट' से प्ररित थी... और इस फिल्म में पहली बार साउंड का इस्तेमाल किया गया और फिल्म में इस्तेमाल किये गये कैमरे में ये खूबी थी कि शूटिंग के दौरान साउंड सीधे रील पर रिकॉर्ड होने लगा... इस फिल्म की रिकॉर्डिंग में 'टनर सिंगल सिस्टम' कैमरे का इस्तेमाल किया गया... 'दे दे खुदा के नाम पर' इस फिल्म में एक गाना था जिसे 'वज़ीर मोहम्मद खान' ने गाया था... इस गाने को हिंदी फिल्म इतिहास का पहला गाना कहा जाता है... उस वक्त ज़्यादा साजो सामान नहीं था लिहाज़ा ये गाना सिर्फ एक हरमोनियम और तबले की मदद से इसे रिकॉर्ड किया गया था... उस दौरान फिल्मों में उन्हीं लोगों को लिया जाता था जो अभिनय करने के साथ साथ गा भी सकते थे... और फिल्मों में गानों की संख्या काफी ज़्यादा होती थी...

First Indian Film 'राजा हरिश्चंद्र' by Dada Saheb Falke

भारत में फिल्मों की शुरुआत हुई साल 1913 में जब देश में पहली बार दादा साहब फाल्के ने 'राजा हरिश्चन्द्र' फिल्म बनाई... दादा साहब फालके का पूरा नाम धुंडीराज गोविंद फालके था... लंदन में ईसा मसीह पर आधारित एक फिल्म को देखने के बाद से ही दादा साहेब फाल्के के मन में फिल्म बनाने की चाहत पल रही थी... काफी वक्त के इंतज़ार और फिल्म बनाने के जज़्बे को कायम रखते हुए दादा साहब ने फिल्म बनाने की शुरुआत की... इस फिल्म को बनाने के लिए उन्हें कई मुश्किलों से रुबरु होना पड़ा... लेकिन फिल्म निर्माण के प्रति अपनी रुचि पर उन्होंने मुश्किलों को हावी नहीं होने दिया और आखिरकार इस फिल्म को बनाने में कामयाबी हासिल की...
                                                 
इस फिल्म का निर्माण दादा साहब के लिए आसान काम नहीं था... और उनके इस सपने को पूरा करने के लिए उनकी पत्नि सरस्वती बाई फालके ने उनका पूरा साथ दिया... आपको ये जानकर हैरानी होगी कि फिल्म को बनाने के दौरान सरस्वती बाई फिल्म के सभी सदस्यों के लिए खाना पकाती थीं... साथ ही साथ वो सभी आर्टिस्ट्स के कपड़े धोने से लेकर उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों का ध्यान रखती थीं... उस वक्त क्रू में लगभग 500 लोग शामिल थे... जिनके रोज़ के खाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की हुआ करती थी... इसके अलावा वो फिल्म के पोस्टर और प्रोडक्शन के काम में उनकी मदद करती थीं... फिल्म का प्रीमियर मुंबई के 'ओलंपिया थियेटर' में मुंबई की बड़ी हस्तियों और अखबारों के संपादकों के बीच अप्रैल 1913 में किया गया था... जबकि ये फिल्म 3 मई 1913 को आम जनता के लिए पर्दे पर उतारी गई और इसका पहला शो 'कोरोनेशन सिनेमा' गिरगांव में किया गया... इस फिल्म को बनाने के बाद दादा साहब फाल्के ने इसके और प्रिंट्स तैयार किये जिन्हें छोटे-छोटे कस्बों में भी जाकर दिखाया गया... दादा साहब फाल्के जब फिल्म का निर्माण कर रहे थे उस वक्त लोग रंगमंच या सिनेमा में काम करना गलत माना करते थे... इसलिये दादा साहेब ने फिल्म में काम करने वालों से कहा था कि कोई अगर पूछे कि वो क्या करते हैं तो उन्हें बताएं कि ये हरिश्चंद्र नाम की फैक्ट्री है जिसमें वो काम करते हैं... दादा साहेब फालके पेंटर राजा रवि वर्मा से खासे प्रेरित थे... जब राजा रवि वर्मा ने राजा हरिश्चंद्र की पेंटिंग्स बनाई तो दादा साहेब ने उसे चलचित्र या जिसे हम सिनेमा कहते हैं... उसके ज़रिए लोगों तक पहुंचाने की योजना बनाई...
                            
उस दौर में महिलाएं रंगमंच या थियेटर में काम करने को राज़ी नहीं होती थी... इस वजह से पुरुष और महिला किरदार दोनों पुरुष कलाकार को निभाने होते थे... दादा साहेब ने काफी कोशिश की कि वो किसी महिला को फिल्म में काम करने के लिए राज़ी नहीं कर सकें और अंत में सालुके जी को हरिश्चंद्र की पत्नी रानी तारामति की भूमिका निभानी पड़ी... सालुके एक होटल में खाना बनाने का काम करते थे... और उन्हें महिला की भूमिका निभाने के लिए दादा साहेब ने राज़ी किया था... इस फिल्म की रील की कुल लंबाई 3700 फिट थी और ये 40 मिनट की फिल्म थी... इस फिल्म का निर्देशन खुद 'दादा साहेब फाल्के' ने किया था... जबकि फिल्म की कहानी 'रणछोड़ भाई उद्याराम' ने लिखी थी... जबकि सिनेमेटोग्राफी 'त्रियंबक बी. तेलंग' की थी....